अटल बिहारी बाजपेयी को  भारतीय राजनीति में काफी सम्मानजनक स्थान प्राप्त है लेकिन सुब्रह्मण्यम स्वामी को उनका घोर विरोधी माना जाता है. स्वामी अटल जी को ढोंगी और स्वार्थी राजनेता मानते थे और समय-समय पर उन पर आरोपण की बौछार करते रहते थे. 1998 में महज 13 दिनों तक चली पहली एनडीए सरकार के पतन का श्रेय स्वामी को ही जाता है। उन्होंने जयललिता और सोनिया गांधी के बीच एनडीए सरकार का समर्थन ना करने के लिए एक बैठक आयोजित की,जो बाद में उनके कड़वे प्रतिद्वंद्वियों में बदल गईं।


अवामी ने वाजपेयी पर बेरहमी से हमला किया, यहां तक कि उनके निजी जीवन को भी नहीं बख्शा। स्वामी के मुताबिक़ “दिल्ली में जापानी विदेश मामलों के मंत्री ने एक पार्टी का आयोजन किया था। वाजपेयी, जो भारत के विदेश मामलों के मंत्री के रूप में वहां मौजूद थे, नशे में थे। मुझे उस रात्रिभोज के लिए भी आमंत्रित किया गया था। मैं विदेश मंत्री को पूरी तरह से नशे में देखकर चौंक गया था … स्वामी ने वाजपेयी को एक “चालाक आदमी” बताया और यहां तक कि संदेह किया कि अगर वाजपेयी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पुलिस के मुखबिर थे।2 दिसंबर 2016 मे एक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल को दिए हुए इंटरव्यू मे भी उन्होंने यह बात साफ कर दी पर पलट कर यह कहा की यह सब उन्होंने जयललिता के कहने पर किया था..

स्वामी ने 1998 के आम चुनावों के दौरान मदुरई सीट से चुनाव लड़ा ओर जीते भी।  जयललिता ने स्वामी को वित्त मंत्री बनाने के लिए कड़ी मेहनत की थी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने स्पष्ट रूप से स्वामी का विरोध किया था, उन्होंने ध्यान नहीं दिया।अप्रैल 1999 में, स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और जयललिता को साथ लाने वाली प्रसिद्ध चाय पार्टी की मेजबानी की। हालांकि उनका इरादा वाजपेयी सरकार को गिराने का था, लेकिन सोनिया गांधी ने जोर देकर कहा कि अगर AIADMK अपना समर्थन वापस लेती है तो ही कांग्रेस तस्वीर में आएगी। अंततः, जया ने 14 अप्रैल, 1999 को समर्थन वापस लेने का पत्र दिया।बाद में 1999 में हुए आम चुनावों में, भाजपा वापस सत्ता में आई, जयललिता ने स्वामी से अपना नाता तोड़ लिया।