मराठा इतिहास में महारानी ताराबाई को लेकर कई विरोधभासी बातें कही गई है. कहीं ताराबाई को एक खलनायिका के रूप में पेश किया गया है तो कहीं उनकी प्रशंसा की गई है .लेकिन ये बात तो तय है की ताराबाई ने सत्ता अपने पास रखने के लिए शिवाजी महाराज के वास्तविक उत्तराधिकारियों के साथ भेदभाव किया जिसे किसी भी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन ये भी सच है कि येसूबाई और शाहूजी की गिरफ्तारी के बाद अगर ताराबाई ने हथियार नहीं उठाया होता तो मराठा साम्राज्य बिखर गया होता .आइये जानते हैं ताराबाई के बारे में …

संभाजी की मृत्यु और उनके पुत्र और पत्नी को औरंगजेब द्वारा कैद कर लिए जाने के बाद संभाजी का छोटा भाई राजाराम अर्थात ताराबाई के पति ने मराठा साम्राज्य की गद्दी संभाली। सन 1700 में किसी बीमारी के कारण राजाराम की मृत्यु हो गई। इसके बाद रानी ताराबाई ने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए और अपने अपने चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय को राजा घोषित कर दिया.

औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगलों ने उसके द्वारा अपहृत किये संभाजी के पुत्र शाहू को मुक्त कर दिया, ताकि सत्ता संघर्ष के बहाने मराठों में फूट डाली जा सके. पता चलते ही रानी ताराबाई ने शाहू को “गद्दार” घोषित कर दिया.ताराबाई के कई प्रयासों के बावजूद शाहू मुग़ल सेनाओं के समर्थन से लगातार जीतता गया और सन 1708 में उसने सातारा पर कब्ज़ा किया, जहाँ उसे राजा घोषित करना पड़ा, क्योंकि उसे मुगलों का भी समर्थन हासिल था. शाहू जी ने बाजीराव पेशवा ने कान्होजी आंग्रे के साथ मिलकर 1714 में ताराबाई को पराजित किया तथा उसे उसके पुत्र सहित पन्हाला किले में ही नजरबन्द कर दिया, जहाँ ताराबाई और अगले 16 वर्ष कैद रही.

1730 तक ताराबाई पन्हाला में कैद रही, लेकिन इतने वर्षों के पश्चात शाहू जो कि अब छत्रपति शाहूजी महाराज कहलाते थे उन्होंने विवादों को खत्म करते हुए सभी को क्षमादान करने का निर्णय लिया ताकि परिवार को एकत्रित रखा जा सके. हालाँकि उन्होंने ताराबाई के इतिहास को देखते हुए उन्हें सातारा में नजरबन्द रखा, लेकिन संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर में छोटी सी रियासत देकर उन्हें वहाँ शान्ति से रहने के लिए भेज दिया.

1748 में शाहूजी बीमार पड़े और लगभग मृत्यु शैया पर ही थे.अब ताराबाई ने फिर से साजिशें रचनी शुरू कर दी। ताराबाई ने एक साजिश के तहत रामराजा को गद्दी पर बिठाया और रामराजा के बहाने और मराठा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली। रामाराजा को उसने कभी भी स्वतन्त्र रूप से काम नहीं करने दिया और सदैव परदे के पीछे से सत्ता के सूत्र अपने हाथ में रखे.ताराबाई 1761 तक जीवित रही. जब उन्होंने अब्दाली के हाथों पानीपत के युद्ध में लगभग दो लाख मराठों को मरते देखा तब उस धक्के को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और अंततः 86 की आयु में ताराबाई का निधन हुआ.