चंगेज़ खान की कब्र आज भी दुनिया के लिए एक रहस्य बनी हुई है .दुनिया के कई देश इस कब्र की तलाश में जमीन और आसमान एक किये हुए हैं.नेशनल जियोग्राफ़िक ने तो वैली ऑफ़ ख़ान प्रोजेक्ट के तहत सैटेलाइट के ज़रिए उसकी क़ब्र तलाशने की कोशिश की थी । 90 के दशक में जापान और मंगोलिया ने मिलकर चंगेज़ ख़ान की क़ब्र तलाशने के लिए एक साझा प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया. जिसका नाम था ‘गुरवान गोल’. इस प्रोजेक्ट के तहत चंगेज़ ख़ान की पैदाइश की जगह माने जाने वाले शहर खेनती में रिसर्च शुरू हुई.लेकिन इसी दौरान इसी साल मंगोलिया में लोकतांत्रिक क्रांति हो गई. जिसके बाद कम्युनिस्ट शासन ख़त्म हो गया और लोकतांत्रिक राज क़ायम हो गया. नई सरकार में ‘गुरवान गोल’ प्रोजेक्ट को भी रुकवा दिया गया.

चंगेज़ खान ने अपने लिए एक अजीब वसीयत बनवाई थी. वो नहीं चाहता था कि उसके मरने के बाद उसका कोई निशान बाक़ी रहे.लेकिन उनके वारिसों ने चंगेज की कब्र बनवा ही दी लेकिन एक दिन ये कब्र अचानक लापता हो गयी। चंगेज ने अपने साथियों को आदेश दिया था कि उसके मरने के बाद उसे किसी गुमनाम जगह पर दफ़नाया जाए. वसीयत के मुताबिक़ ऐसा ही किया गया. सैनिकों ने उसे दफ़नाने के बाद उसकी क़ब्र पर क़रीब एक हज़ार घोड़ों को दौड़ाकर ज़मीन को इस तरह से बराबर कर दिया ताकि कोई निशान बाक़ी ना रहे.
चंगेज़ ख़ान की क़ब्र तलाशने में विदेशी लोगों की ही दिलचस्पी थी. मंगोलिया के लोग चंगेज़ ख़ान की क़ब्र का पता लगाना नहीं चाहते इसकी बड़ी वजह एक डर भी है. कहा जाता रहा है कि अगर चंगेज़ ख़ान की क़ब्र को खोदा गया तो दुनिया तबाह हो जाएगी.

मंगोलिया के लोग चंगेज़ ख़ान का नाम बडी इज़्ज़त और फ़ख़्र से लेते हैं. इनके मुताबिक़ अगर चंगेज़ ख़ान ख़ुद चाहता कि उसके मरने के बाद भी लोग उसे याद करें तो वो कोई वसीयत नहीं करता. अगर वो चाहता तो कोई ना कोई अपनी निशानी ज़रूर छोड़ता. यही वजह है कि मंगोलियाई लोग नहीं चाहते कि अब उसकी क़ब्र की तलाश की जाए. जो वक़्त की धुंध में कहीं गुम हो चुका है उसे फिर ना कुरेदा जाए.