कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा गुजरात के गांधीनगर में पहली बार सीधे जनता से मुखातिब हुई .यहाँ आयोजित कांग्रेस की रैली में पहले ही भाषण के जरिए प्रियंका गांधी ने बीजेपी और मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए उन्हें देश की तमाम समस्याओं का जिम्मेदार ठहराया.मोदी के गढ़ में मोदी को ललकारना या तो प्रियंका के अतिआत्मविश्वास का नतीजा है या फिर कांग्रेस की ख़राब रणनीति का हिस्सा .इस चुनाव में प्रियंका को कांग्रेस के ट्रंप कार्ड के तौर पर देखा जा रहा है .पार्टी को उम्मीद है की वो प्रियंका के सहारे मोदी को हराकर सत्ता में वापसी आर सकती हैं. हालांकि प्रियंका के व्यक्तित्व में अब तक ऐसी कोई चमकारिक शक्ति नहीं दिखी है .बहरहाल आइये जानते है गाँधी परिवार की बेटी होने के अलावा प्रियंका गाँधी की और क्या-क्या उपलब्धियां हैं …

1999 के चुनाव अभियान के दौरान, बीबीसी के लिए एक साक्षात्कार में प्रियंका ने कहा: मेरे दिमाग में यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि राजनीति शक्तिशाली नहीं है, बल्कि जनता अधिक महत्वपूर्ण है और मैं उनकी सेवा राजनीति से बाहर रहकर भी कर सकती हूँ।तथापि उनके औपचारिक राजनीति में जाने का प्रश्न परेशानीयुक्त लगता है: “मैं यह बात हजारों बार दोहरा चुकी हूँ, कि मैं राजनीति में जाने की इच्छुक नहीं हूँ…”।

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जहाँ राहुल गाँधी ने राज्यव्यापी अभियान का प्रबंधन किया, वही वह अमेठी रायबरेली क्षेत्र के दस सीटों पर ध्यान केंद्रित कर रही थी, वहां दो सप्ताह बिता कर उन्होनें पार्टी कार्यकर्ताओं में मध्य सीटों के आवंटन को लेकर हुई अंदरूनी कलह को सुलझाने की कोशिश की। कुल मिलाकर, कांग्रेस पार्टी राज्य में हासिये पर चली गई, उसे 402 में से मात्र 22 सीटों पर ही जीत हासिल हुई, जो की इन दशकों में न्यूनतम है। लेकिन, इसमें व्यापक रूप से प्रियंका गाँधी के अन्तर संगठनात्मक गुण और वोट खींचने की क्षमता का पता चलता है, जिस कांग्रेस को 2002 के विधानसभा में सिर्फ दो सीटें हासिल हुई थी, उसने सात सीटें हथिया ली, इन सभी सीटों पर महत्वपूर्ण बढ़त प्राप्त हुई, जो कि कार्यकर्ताओं में पार्टी अंतर्कलह के बावजूद संभव हुआ।

बहरहाल इस चुनाव में प्रियंका हर तरह से सक्रिय हो चुकी है .देखते हैं कांग्रेस पार्टी को इसका कितना फायदा मिलता है .