1979 में केंद्र में मोरारजी देसाई सरकार थी तब संसद के मानसून सत्र की शुरुआत अविश्वास प्रस्ताव से हुई। 27 जुलाई 1979 को जॉर्ज फर्नांडिस ने उद्योग मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और मोरारजी देसाई का साथ छोड़कर चरणसिंह के खेमे में जा मिले। जॉर्ज इस तरह से पाला बदल लेंगे उस वक्त किसी ने नही सोचा था। इसका नतीजा ये हुआ कि मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई और चरण सिंह प्रधानमंत्री बन गए।आखिर ऐसा क्या हुआ था कि जॉर्ज ने मोरारजी का साथ छोड़कर चरण सिंह के खेमे में जा मिले।

इसके पीछे बताया जाता है कि जॉर्ज के मित्र और उस वक्त के सांसद मधु लिमये का हाथ था। मधु लिमये ने उस वक्त संसद में दोहरी सस्यता का मुद्दा बड़े जोरशोर से उठाया जिसका नतीजा ये हुआ कि जनता पार्टी में विभाजन हो गया और जॉर्ज चरण सिंह खेमे में जा मिले। बताया जाता है कि मधु लिमये सरकार गिरने से पहले जॉर्ज से मिले थे. दोनों में रात भर इस बात को लेकर बहस होती होती रही। मधु ने जाते वक्त अपने पुराने दिनों का वास्ता दिया और जॉर्ज अपने इस पुराने दोस्त को मना नहीं कर पाए। हालाँकि जॉर्ज की मोरारजी सरकार से कोई नाराजगी नहीं थी लेकिन वो अपने दोस्त को नाराज नहीं करना चाहते थे .इसलिए सुबह होते ही उन्होंने चरण सिंह को समर्थन देने का ऐलान कर दिया .जिसका नतीजा ये हुआ की मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई।

अपने लंबे राजनितिक करियर में एक तेज तर्रार नेता के रुप में अपनी पहचान बनाने वाले 87 वर्षीय जॉर्ज फर्नांडिस ऐसे कई कारनामे कर चुके थे .खैर चरण सिंह कौंग्रेस के समर्थन से सरकार तो बना ली लेकिन एक महीने के अन्दर इस सरकार को गिरा दिया और चुनाव करवा कर फिर से सत्ता में लौट आई .