यदुवंश में पैदा हुए बलभद्र यानि बलराम, भगवान् श्रीकृष्ण के सौतेले बड़े भाई थे .दोनों भाईयों में अपार स्नेह था और दोनों एक ही साथ पलकर बड़े हुए थे .लेकिन महाभारत में एक प्रसंग है जब दुर्योधन की दुर्दशा देख कर बलराम सीधे श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारने लगे .आइये जानते हैं इस प्रसंग के बारे में

महाभारत के युद्ध में कर्ण की मौत के बाद दुर्योधन को अपनी पराजय निश्चित नजर आने लगी .वो भाग कर एक सरोवर में छुप गया .किसी बहेलिये ने पांडवों को दुर्योधन के छिपने की खबर बता दी .श्रीकृष्ण पांडवों सहित दुर्योधन का वध करने सरोवर के पास पहुँच गए और उन्होंने छिपे हुए दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा .दुर्योधन इस ललकार से गुस्से में आ गया और उसने भीम को गदा युद्ध के लिए चुनौती दी जिसके बाद दुर्योधन और भीम में भयंकर गदायुद्ध छिड़ गया .

जब भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध चल रहा था तब बलराम भी वहाँ आ पहुंचे .दुर्योधन बलराम का शिष्य था और युद्ध की सारी कलाएं उन्होंने बलराम से ही सीखी थी .बलराम वहां पहुँच कर अपने शिष्य दुर्योधन का उत्साह बढाने लगे जिससे उसका पलड़ा भारी हो गया .गांधारी के आशीर्वाद से दुर्योधन की जांघ को छोड़ सारा शरीर वज्र के सामन था जिसपर किसी प्रहार का कोई असर नहीं हो सकता था .ऊपर से बलराम ने दुर्योधन का उत्साह बढ़ा कर भीम के लिए संकट पैदा कर दिया था .भीम की पराजय निकट देख श्रीकृष्ण ने भीम को इशारा किया कि वो दुर्योधन की जन्घो पर गदा प्रहार करे और भीम ने ऐसा ही किया .लगातार गदा प्रहार से उसने दुर्योधन की जांघें तोड़ डाली जिसके कारण दुर्योधन धराशायी हो गया. जाँघों पर वार करना युद्ध नियमों के विपरीत था .इस छल से बलराम काफी क्रोधित हो गए और उन्होंने इसके लिए श्रीकृष्ण को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें युद्ध के ललकारने लगे .श्रीकृष्ण ने तो वैसे भी हथियार ना उठाने की कसम खा रखी थी .बलराम का क्रोध देख उन्होंने उन्हें समझाया कि भीम ने दुर्योधन की जांघ तोड़ने का प्रण द्रौपदी के चीरहरण के समय ही ले लिया था इसलिए इसे छल नहीं माना जा सकता .द्रौपदी के अपमान वाली बात सुनते ही बलराम शांत हो गए और ये कहते हुए वहां से चले गए कि नारी के अपमान की सजा तो मिलनी ही चाहिए .